Monday, March 10, 2008

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देशभक्तों का महान संगठन ?

प्रभाष जोशी
कल आपने देखा कि जिसे गाना था उसने वंदेमातरम् गाया जिसे नहीं गाना था उसने नहीं गाया. जिन राज्यो में भारतीय जनता पार्टी का राज है और जहां वह दूसरी पार्टी के साथ राज कर रही है, वहां की सरकारों ने वंदेमातरम् गाने का अनिवार्य कर दिया था. लेकिन जहां कॉग्रेस और दूसरी पार्टियों का राज है वहां इसके गाने न गाने की छूट थी. जिन भाजपाई सरकारों ने इसे अनिवार्य किया वे भी दावा नहीं कर सकतीं कि जो मुसलमान, ईसाई और सिख इसे गाना नहीं चाहते थे उनसे भी वंदेमातरम् गवा लिया गया है. आदमी अगर ऐसा ही मशीनी होता और गाना रेकॉर्ड बजवाने जैसा मैकेनिकल काम होता तो न तो महान गीत होते न महान संगीत. अपनी मां, मातृभूमि और देश से आप सहज और स्वैच्छिक प्रेम करते हैं. कोई करवा नहीं सकता. सहजता और स्वैच्छिकता संस्कृति की महान उपलब्धियों की कुंजी है. जो राष्ट्र अपने नागरिकों की सहजता और स्वैच्छिकता का आदर करता है और उन पर कोई चीज़ थोप कर उन्हें मजबूर नहीं करता सभ्यता और संस्कृति में वह उतना ही विकसित होता है.

कोई प्रेरित व्यक्ति जितने बड़े काम कर सकता है मजबूर आदमी नहीं कर सकता है. अगर इस सत्य को आप समझते हैं तो लोगों को प्रेरित करेंगे, जो वे मन से और सहजता से कर सकते हैं उसे करने की छूट देंगे और इस स्वतंत्र और स्वैच्छिक वातावरण में जो प्राप्त होगा उसका गौरव गान करेंगे. वंदेमातरम् के राष्ट्रगीत होने की जैसे भी और जैसी भी मनाई गई शताब्दी पर अगर देशप्रेम, शहीदों और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के प्रति कृतज्ञता और समर्पण को ऊंचा उठा देने वाली भावना सर्वव्यापी नहीं हुई तो दोष उन्हीं का है जो इसका गाना अनिवार्य करना चाहते थे. यह पहली बार नहीं हुआ है कि मुसलमानों के एक तबके ने वंदेमातरम् के गाने को इस्लाम विरोधी कहा हो. वैसे ही यह भी पहली बार नहीं हुआ है कि संघ परिवारियों ने इसके गाने को मुसलमानों के लिए अनिवार्य करने का हल्ला मचाया हो. मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बीच यह झगड़ा आज़ादी के बहुत पहले से चला आ रहा है. आज़ादी के आंदोलन की मुख्यधारा तो कॉग्रेस की ही थी और उसी ने वंदेमातरम् को बाक़ायदा अपनाया भी. लेकिन उसी ने इसे गाते हुए भी इसका गाना स्वैच्छिक रखा. कॉग्रेस का सन १९३७ के अधिवेशन का प्रस्ताव इसका प्रमाण है. उसी ने इसे स्वतंत्र लोकतांत्रिक गणराज्य भारत का राष्ट्रगीत भी बनाया.


अल्पसंख्यकों खासकर मुसलमानों के लिए वंदेमातरम् का गाना अनिवार्य करने की मांग संघ परिवारियों की ही रही है. ये वही लोग हैं जिनने उस स्वतंत्रता संग्राम को ही स्वैच्छिक माना है जिसमें से वंदेमातरम् निकला है. अगर भारत माता की स्वतंत्रता के लिए क़ुरबान हो जाना ही देशभक्ति की कसौटी है तो संघ परिवारी तो उस पर चढ़े भी नहीं, खरे उतरने की तो बात ही नहीं है. लालकृष्ण आडवाणी ने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता कि राष्ट्रभक्ति का कोई प्रतीक स्वैच्छिक हो. तो फिर आज़ादी की लड़ाई के निर्णायक ”भारत छोड़ो आंदोलन” के दौरान वे खुद क्या कर रहे थे? उनने खुद ही कहा है- ”मैं संघ में लगभग उन्हीं दिनों गया जब भारत छोड़ो आंदोलन छिड़ा था क्योंकि मैं मानता था कि कॉग्रेस के तौर-तरीक़ों से तो भारत आज़ाद नहीं होगा. और भी बहुत कुछ करने की ज़रूरत थी.” संघ का रवैया यह था कि जब तक हम पहले देश के लिए अपनी जान क़ुरबान कर देने वाले लोगों का मज़बूत संगठन नहीं बना लेते, भारत स्वतंत्र नहीं हो सकता. लालकृष्ण आडवाणी भारत छोड़ो आंदोलन को छोड़कर करांची में आरम-दक्ष करते देश पर क़ुरबान हो सकने वाले लोगों का संगठन बनाते रहे. पांच साल बाद देश आज़ाद हो गया. इस आज़ादी में उनके संगठन संघ- के कितने स्वयंसेवकों ने जान की क़ुरबानी दी? ज़रा बताएं.

एक और बड़े देशभक्त स्वयंसेवक अटल बिहारी वाजपेयी हैं. वे भी भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बच्चे नहीं संघ कार्य करते स्वयंसेवक ही थे. एक बार बटेश्वर में आज़ादी के लिए लड़ते लोगों की संगत में पड़ गए. उधम हुआ. पुलिस ने पकड़ा तो उत्पात करने वाले सेनानियों के नाम बताकर छूट गए. (दस्तावेजी प्रमाण के लिए यहां देखें) आज़ादी आने तक उनने भी देश पर क़ुरबान होने वाले लोगों का संगठन बनाया जिन्हें क़ुरबान होने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी क्योंकि वे भी आज़ादी के आंदोलन को राष्ट्रभक्ति के लिए स्वैच्छिक समझते थे.

अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने को देशभक्तों का महान संगठन कहे और देश पर जान न्योछावर करने वालों की सूची बनाए तो यह बड़े मज़ाक का विषय है. सन् १९२५ में संघ की स्थापना करने वाले डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार को बड़ा क्रांतिकारी और देशभक्त बताया जाता है. वे डॉक्टरी की पढ़ाई करने १९१० में नागपुर से कोलकाता गए जो कि क्रांतिकारियों का गढ़ था. हेडगेवार वहां छह साल रहे. संघवालों का दावा है कि कोलकाता पहुंचते ही उन्हें अनुशीलन समिति की सबसे विश्वसनीय मंडली में ले लिया गया और मध्यप्रांत के क्रांतिकारियों को हथियार और गोला-बारूद पहुंचाने की ज़िम्मेदारी उन्हीं की थी. लेकिन ना तो कोलकाता के क्रांतिकारियों की गतिविधियों के साहित्य में उनका नाम आता है न तब के पुलिस रेकॉर्ड में. (इतिहासकारों का छोड़े क्योंकि यहां इतिहासकारों का उल्लेख करने पर कुछ को उनकी निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करने का अवसर मिल सकता है) खैर, हेडगेवार ने वहां कोई महत्व का काम नहीं किया ना ही उन्हें वहां कोई अहमियत मिली. वे ना तो कोई क्रांतिकारी काम करते देखे गए और ना ही पुलिस ने उन्हें पकड़ा. १९१६ में वे वापस नागपुर आ गए.


लोकमान्य तिलक की मृत्यु के बाद वे कॉग्रेस और हिन्दू महासभा दोनों में काम करते रहे. गांधीजी के अहिंसक असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलनों में भाग लेकर ख़िलाफ़त आंदोलन के वे आलोचक हो गए. वे पकड़े भी गए और सन् १९२२ में जेल से छूटे. नागपुर में सन् १९२३ के दंगों में उनने डॉक्टर मुंजे के साथ सक्रिय सहयोग किया. अगले साल सावरकर का ”हिन्दुत्व” निकला जिसकी एक पांडुलिपी उनके पास भी थी. सावरकर के हिन्दू राष्ट्र के सपने को साकार करने के लिए ही हेडगेवार ने सन् १९२५ में दशहरे के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की. तब से वे निजी हैसियत में तो आज़ादी के आंदोलन और राजनीति में रहे लेकिन संघ को इन सबसे अलग रखा. सारा देश जब नमक सत्याग्रह और सिविल नाफ़रमानी आंदोलन में कूद पड़ा तो हेडगेवार भी उसमें आए लेकिन राष्टीय स्वयंसेवक संघ की कमान परांजपे को सौंप गए. वे स्वयंसेवकों को उनकी निजी हैसियत में तो आज़ादी के आंदोलन में भाग लेने देते थे लेकिन संघ को उनने न सशस्त्र क्रांतिकारी गतिविधियों में लगाया न अहिंसक असहयोग आंदोलनों में लगने दिया. संघ ऐसे समर्पित लोगों के चरित्र निर्माण का कार्य कर रहा था जो देश के लिए क़ुरबान हो जाएंगे. सावरकर ने तब चिढ़कर बयान दिया था, ”संघ के स्वयंसेवक के समाधि लेख में लिखा होगा- वह जन्मा, संघ में गया और बिना कुछ किए धरे मर गया.”

हेडगेवार तो फिर भी क्रांतिकारियों और अहिंसक असहयोग आंदोलनकारियों में रहे दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर तो ऐसे हिन्दू राष्ट्रनिष्ठ थे कि राष्ट्रीय आंदोलन, क्रांतिकारी गतिविधियों और ब्रिटिश विरोध से उनने संघ और स्वयंसेवकों को बिल्कुल अलग कर लिया. वाल्टर एंडरसन और श्रीधर दामले ने संघ पर जो पुस्तक द ब्रदरहुड इन सेफ़्रॉन- लिखी है उसमें कहा है, ”गोलवलकर मानते थे कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर पाबंदी लगाने का कोई बहाना अंग्रेज़ों को न दिया जाए.” अंग्रेज़ों ने जब ग़ैरसरकारी संगठनों में वर्दी पहनने और सैनिक कवायद पर पाबंदी तो संघ ने इसे तत्काल स्वीकार किया. २९ अप्रैल १९४३ को गोलवलकर ने संघ के वरिष्ठ लोगों के एक दस्तीपत्र भेजा. इसमें संघ की सैनिक शाखा बंद करने का आदेश था. दस्तीपत्र की भाषा से पता चलता है कि संघ पर पाबंदी की उन्हें कितनी चिंता थी- ”हमने सैनिक कवायद और वर्दी पहनने पर पाबंदी जैसे सरकारी आदेश मानकर ऐसी सब गतिविधियां छोड़ दी हैं ताकि हमारा काम क़ानून के दायरे में रहे जैसा कि क़ानून को मानने वाले हर संगठन को करना चाहिए. ऐसा हमने इस उम्मीद में किया कि हालात सुधर जाएंगे और हम फिर ये प्रशिक्षण देने लगेंगे. लेकिन अब हम तय कर रहे हैं कि वक़्त के बदलने का इंतज़ार किए बिना ये गतिविधियां और ये विभाग समाप्त ही कर दें.” (ये वो दौर था जब नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसे क्रांतिकारी अपने तरीक़े से संघर्ष कर रहे थे) पारंपरिक अर्थों में गोलवलकर क्रांतिकारी नहीं थे. अंग्रेज़ों ने इसे ठीक से समझ लिया था.


सन् १९४३ में संघ की गतिविधियों पर तैयार की गई एक सरकारी रपट में गृह विभाग ने निष्कर्ष निकाला था कि संघ से विधि और व्यवस्था को कोई आसन्न संकट नहीं है. १९४२ के भारत छोड़ो आंदोलन में हुई हिंसा पर टिप्पणी करते हुए मुंबई के गृह विभाग ने कहा था, ”संघ ने बड़ी सावधानी से अपने को क़ानूनी दायरे में रखा है. खासकर अगस्त १९४२ में जो हिंसक उपद्रव हुए हैं उनमें संघ ने बिल्कुल भाग नहीं लिया है.” हेडगेवार सन् १९२५ से १९४० तक सरसंघचालक रहे और उनके बाद आज़ादी मिलने तक गोलवलकर रहे. इन बाईस वर्षों में आज़ादी के आंदोलन में संघ ने कोई योगदान या सहयोग नहीं किया. संघ परिवारियों के लिए संघ कार्य ही राष्ट्र सेवा और राष्ट्रभक्ति का सबसे बड़ा काम था. संघ का कार्य क्या है? हिन्दू राष्ट्र के लिए मर मिटने वाले स्वयंसेवकों का संगठन बनाना. इन स्वयंसेवकों का चरित्र निर्माण करना. उनमें ऱाष्ट्रभक्ति को ही जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा और शक्ति मानने की परम आस्था बैठाना. १९४७ में जब देश आज़ाद हुआ तो देश में कोई सात हज़ार शाखाओं में छह से सात लाख स्वयंसेवक भाग ले रहे थे. आप पूछ सकते हैं कि इन एकनिष्ठ देशभक्त स्वयंसेवकों ने आज़ादी के आंदोलन में क्या किया? अगर ये सशस्त्र क्रांति में विश्वास करते थे तो अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ इनने कितने सशस्त्र उपद्रव किए, कितने अंग्रेज़ों को मारा और उनके कितने संस्थानों को नष्ट किया. कितने स्वयंसेवक अंग्रेज़ों की गोलियों से मरे और कितने वंदेमातरम् कहकर फांसी पर झूल गए? हिन्दुत्ववादियों के हाथ से एक निहत्था अहिंसक गांधी ही मारा गया.

संघ और इन स्वयंसेवकों के लिए आज़ादी के आंदोलन से ज़्यादा महत्वपूर्ण स्वतंत्र हिन्दू राष्ट्र के लिए संगठन बनाना और स्वयंसेवक तैयार करना था. संगठन को अंग्रेज़ों की पाबंदी से बचाना था. इनके लिए स्वतंत्र भारत राष्ट्र अंग्रेज़ों से आज़ाद कराया गया भारत नहीं था. इनका हिन्दू राष्ट्र तो कोई पांच हज़ार साल से ही बना हुआ है. उसे पहले मुसलमानों और फिर अंग्रेज़ों से मुक्त कराना है. मुसलमान हिन्दू राष्ट्र के दुश्मन नंबर एक और अंग्रेज़ नंबर दो थे. सिर्फ़ अंग्रेज़ों को बाहर करने से इनका हिन्दू राष्ट्र आज़ाद नहीं होता. मुसलमानों को भी या तो बाहर करना होगा या उन्हें हिन्दू संस्कृति को मानना होगा. इसलिए अब उनका नारा है- वंदे मातरम् गाना होगा, नहीं तो यहां से जाना होगा. सवाल यह है कि जब आज़ादी का आंदोलन- संघ परिवारियों के लिए स्वैच्छिक था तो स्वतंत्र धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक भारत में वंदेमातरम् गाना स्वैच्छिक क्यों नहीं हो सकता? भारत ने हिन्दू राष्ट्र को स्वीकार नहीं किया है. यह भारत संघियों का हिन्दू राष्ट्र नहीं है. वंदेमातरम् राष्ट्रगीत है, राष्ट्रीयता की कसौटी नहीं
साभार- जनसत्ता,

17 comments:

NAGRIK said...

प्रभाष जी महान हैं. एक तरफ़ अटल जी के लत्ते उतारते हैं टू दूसरी तरफ़ ओम थानवी जैसे शराबी, शकुनी, और अस्स्तीं के सौंप पालते हैं. विवेक सक्सेना बता रहे थे की थानवी का एक महल बन रहा है और आधे से ज्यादा पत्रकारों की ड्यूटी उस में लगी है. किसी को पता हो तो बताए .

NAGRIK said...

aur ye bhee ki inhein yani shri yut om thanvee ko rajsthan patrika se kyon nikaala gaya thaa.

bhatkaa hua hindustani-ashish said...

शानदार ..........वेसे सबसे पहले प्रभाष जी को शुभकामनाये

Anonymous said...

manoj mishra mukhbiri ker deha

Anonymous said...

nagrik ji se mai bhi sahmat ho om ne to prabhash ji ke sare karibi logo ko
bahar ker diya ram bahadur rai ko nikal diya,kumar aanand ko ghushne nahi diya,sushil kumar singh ko hata diya,sumeet ko hataya,pradeep singh ki fajihat ker bhagaya,ravindra tripathi per sarkari sudha lene ke aarop me bengal bhej diya,union ke chhaker me ambrish kumar ko delhi se bahar ker diya,manglesh dabral per darubaji ka aaroop laga ker badnam kiya phir sahara me shikayat ker manoher kr sath bahar karva diya.jai ho

Anonymous said...

bada kabil sampadak hai itne logo se nipat leta hai vaise jitne logo ka nam liya unme pratibha kya thi ram bahadur ke patrkarita chandrashekher se suru hoker chil lifter per khatam ho gai,vyas ke rajsthan ka khel sabhi jante hai.achutanand ne do lekh likha ho to bata de ,rahul dev to parvi vale pahle sampadak rahe jinhone aate hi kumar aanand ko hataya aur pradeep ko mumbai bhej diya aaj tak unhone kya kiya hai yeh kai nahi janta.om in logo se behter hai aur rahenge.
ajit

Anonymous said...

vivek ji badhai aap hi vyaash ji asli chele nikle.jab sare bihari champu ban gaye to kisi ne to bola.
tripathi

BHAGAT AINGH said...

ओम थानवी की प्रतिभा अनंत है. तभी तो उन्होंने अजित जैसे भडुए पाल रखे हैं. राहुल देव और अच्युतानंद मिश्रा की हरकतें तो सभी जानते हैं मगर ओने ओम जी तो किसी को कानो कान ख़बर नहीं होने देते और खेल कर जाते हैं. बेटी की शादी में अशोक गहलोत आ गए तो जयपुर भास्कर में फोन करके ख़बर छपवा ली. जिनके नाम ले रहे हो भाई उनका आधा काम कर के तो बताओ. आलोक तोमर के बारे में लिखना भूल गए आप जिन्हें श्री थानवी आधे घंटे तक टीवी पर बैठ कर गाली दे रहे थे कि इसे तो लिखना ही नहीं आता. जनसत्ता को जबसता रहने दो नुक्कड़ नाटक मत बनाओ. हमें थानवी के होने से कोई दिक्कत नहीं है. फिल्मों में शक्ति कपूर होते ही हैं मगर उनसे आक्रोश या अर्ध सत्य जैसे परफोर्मेंस की उम्मीद करना तो ऐसा ही होगा जैसे मनोज मिश्रा से शुद्ध हिन्दी लिखवाना. अजित का पतिव्रत भाव उन्हें मुबारक मगर सारी दुनिया उनके लिए करवा चौथ नहीं रख सकती.

Anonymous said...

aalok tomar ke khilaf cartoon case ka hua kya? es-1 ke maalikon ne jo case kiya tha, jalsaazi kaa vah to highcourt ne pahlee hearing mein kharij kar diya.

Anonymous said...

bhasha se hi jahir ho gaya ki yeh nakli jansatta hai .kala sanskriti film sangeet jaise vidha me om thanvi
ke aage koi nahi tharata.nam bhagat singh rakh lene se koi krantikari nahi ho jata.
ajit

PRADIP SHRIVASTAV said...

कार्टून के मामले में दिल्ली पुलिस आलोक तोमर के खिलाफ दो साल में तय ही नहीं कर पाई कि आरोप लगाना क्या है,. वैसे दिल्ली पुलिस का कहना है कि उसके पूर्व बास के के पाल को आलोक जी से जान का खतरा है और उसने दिल्ली हाई कोर्ट में उनकी ज़मानत रद्द करने की अर्जी लगा राखी है. आलोक तोमर से यह डर यही बताता है कि वे अंडरवर्ल्ड के आदम होंगे या ख़ुद चम्बल के डाकू

PRADIP SHRIVASTAV said...

हे गुमनाम जी, ॐ थानवी को भांड - मीरासी की श्रेणी में लाने के लिए धन्यवाद. वैसे एक राग बत्ताओ जो आपके आदर्श गा लेते हों, या कोई उनकी पेंटिंग दिखा दो. हम क्रांतिकारी सही मगर सिर्फ़ सादर सूचनार्थ जूता दस नंबर का पहनते हैं

Anonymous said...

pradeep ji ahsaan bhool gaye videsh to aap ko thanvi ne hi bheja tha.jis thali me khate hai usme chedv nahi karte.

Chandan said...

झुठी बाते नमक मीर्च लगाकर जानना है तो जनसत्ता
पढो़।

झुठे लोगो की अच्छी मंडली बना रखी है।

prashant said...

Pravash jee bade patrkaar hain.J.P.
andolan me bhee bhaag liaa hai.Undino J.P. ke bagal bale kamre
me baithkar redio par filmi gaane suna karte the.aisa mere pitajee ne mujhe bataya tha.yahi unka tabka andolan tha.aur ab? HINDUTW ko galiakar west& Arab cont. se pasa batorna unka dhandha hai.Itne bade bidwan hone ke babjud budhhi tab bhee bharst thee ab bhee bhrast hai.Bande matram.

kumar said...

aap logo ki aapsi ladayi me patrakarita badnaam ho rahi hai,, nalayako kuch to dhyaan karo...

mihir said...

प्रभाष जी लगता है कि आप संघ के नाम पर भयानक पूर्वाग्रह रखते हैं....कभी उत्तर पूर्व के राज्यों मैं जाकर देखना वहां संघ क्या कार्य कर रहा है...सामाजिक समरसता के लिए संघ ने जो किया है वो अतुलनीय है....एक बात आप भूल गये लिखना संघ के बारे मैं जब चाचा नेहरू ने जो कि आपसे भी ज्यादा संघ विरोधी थे ...चीन के युद्ध के बाद संघ को 26 जनवरी की परैड मैं सम्मिलित करने को आमंत्रित किया था ..युद्ध के दौरान स्वयंसेवकों की निस्वार्थ सेवा को देखते हुए....