Monday, March 10, 2008

क्योंकि हॉकी क्रिकेट नहीं है


क्योंकि हॉकी क्रिकेट नहीं है
आलोक तोमर
कवंर पाल सिंह गिल को लगता है कि जीते जी मोक्ष प्राप्त हो चुका है। लगभग अस्सी साल में पहली बार भारत की हॉकी टीम ओलंपिक जीतना तो दूर, वहां के मैदान में जाने लायक भी नहीं बची और इस पर जब गिल साहब की राय पूछी गई, तो उनका कहना था कि वे वक्त आने पर जवाब देंगे। भारत के राष्ट्रीय खेल को मोहल्ला स्तर का गिल्ली-डंडा बना देने वाले महारथियों से ऐसे ही जवाब की उम्मीद थी। गिल साहब से तो और भी क्योंकि वे भारतीय हॉकी फैडरेशन के अध्यक्ष जरूर हैं, लेकिन उनका ज्यादातर समय या तो जाम के साथ बीतता है या जाम के बाद होने वाली उनकी हरकतों की वजह से अदालतों में माफी मांगते हुए।

आज हॉकी के लिए और इसीलिए देश के लिए शर्मनाक दिन तो है ही, मगर आखिरी बार हॉकी का विश्व कप जीतने वाली टीम के कप्तान और बाद में नेता बन गए असलम शेर खान का गुस्सा भी कम जायज नहीं है। खान कहते हैं कि जितने भी खेल एसोसिएशन या फैडरेशन हैं, उनमें खिलाड़ियों के लिए कोई जगह नहीं है। हालांकि यह बात सबके लाड़ले क्रिकेट पर भी लागू होती है, मगर क्रिकेट दनादन आगे बढ़े जा रही है और हॉकी खेलने वालों को कुछ ऐसी नजर से देखा जाता है, जैसे हवाई जहाज में चलने वाले उतरते समय रन वे के पास बनी झुग्गियों को देखते हैं।

सवाल सिर्फ यह नहीं है कि हॉकी की इतनी दुर्दशा के लिए कौन जिम्मेदार है। क्रिकेट को छोड़ कर और एक हद तक टेनिस और शतरंज के अलावा अपने देश में लगता ही नहीं कि कोई खेल खेला जाता है। अगर शक हो तो आने वाले कॉमनवैल्थ खेल देख लीजिएगा, जिसमें मेजबान हम होंगे और सारे मैडल मेहमान ले जाएंगे। क्रिकेट की निंदा करने का कोई इरादा नहीं है लेकिन जो बात सच है, वह कहे बिना रहा भी नहीं जा सकता। आपने देखा कि टीम इंडिया के सितारे आस्टे्रलिया को उसी की जमीन पर निपटा कर भारत लौटे, तो उनकी दीन-दुनिया ही बदल गई। साइकिलों पर चलने वाले जहाज चार्टर करने की हालत में आ गए और उनका अभिनंदन ऐसे किया गया, जैसा करगिल के विजेताओं का भी नहीं किया गया था।

उधर हॉकी की दशा देखिए। हॉकी का बड़े से बड़ा टूर्नामेंट जीत लिया जाए, तो भी भारत सरकार डेढ़ लाख से ले कर चार लाख रुपए से ज्यादा का इनाम नहीं देती। यह इनाम भी टीम के चौदह खिलाड़ियों में बंट कर कितना रह जाता होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। हॉकी के खिलाड़ियों को विदेश भेजने के लिए सरकार के पास अपवाद स्वरूप ही पैसे होते हैं। उनके प्रशिक्षण के लिए स्टेडियम इसीलिए नहीं मिलते क्योंकि उन्हें हमारे देश के शाही खेल में बुक करवाया हुआ होता है।

भारत ने पहली बार 1928 में एर्म्स्टडम में ओलंपिक में टीम उतारी थी और हालैंड को तीन गोल से हरा कर स्वर्ण पदक जीता था। हारने वाली टीम को तो एक भी गोल दागने का मौका नहीं दिया गया। 1928 से 1956 के बीच के 28 सालों में भारत ने ओलंपिक में लगातार छह स्वर्ण पदक जीते और इस पूरे दौर में भारत ने चौबीस ओलंपिक मैच खेले, सारे जीते और कुल 178 गोल दागे। पहली बार 1960 में इन 28 जीतों के बाद भारत सिर्फ एक गोल से रोम ओलंपिक में पाकिस्तान से हार गया था। संयोग से इसी ओलंपिक में भारत के अभी तक के सबसे तेज धावक माने जाने वाले मिल्खा सिंह सेंकेंड के लगभग सौवें हिस्से से पदक पाने से चूक गए थे।

अगले ओलंपिक में यानी 1964 में टोक्यो में भारत ने अपना स्वर्ण पदक वापस ले लिया और आखिरी स्वर्ण पदक 1980 में मॉस्को में जीता गया था। इसके बाद की पतन गाथा आपको मालूम ही है। हम किंवदंतियों और भूली हुई दंत कथाओं की तरह ध्यानचंद और कुंवर दिग्विजय सिह बाबू को याद करते हैं। इन दोनों को जादूगर कहा जाता है। 1949 में जब बाबू भारतीय टीम के कप्तान थे तो दुनिया की सभी टीमों ने मिल कर जो 236 गोल किए थे, उनमें से 99 सिर्फ बाबू के थे।

ध्यानचंद के बेटे अशोक कुमार भी भारतीय टीम में थे और शानदार खिलाड़ी माने जाते थे। ध्यानचंद के बारे में तो यह मशहूर है कि गेंद उनकी स्टिक से चिपकी रहती थी और गोल तक पहुंच कर ही छूटती थी। कई शिकायतों के बाद उनकी स्टिक की जांच भी की गई कि कहीं इसमें कोई चुंबक तो नहीं लगा हुआ है। उनके छोटे भाई रूप सिंह भी उसी टीम में थे और सबसे तेज खिलाड़ियों में से एक थे। हॉकी के प्रति रूप सिंह का समर्पण इस हद तक था कि वे झांसी से बस में बैठ कर भिंड में लगभग दो सौ किलोमीटर की यात्रा करके हमारे स्कूल में हॉकी सिखाने आते थे और हॉस्टल के एक कमरे में जमीन पर सोते थे। खाना भी वे इटावा रोड के एक ढाबे में खाते थे।

अब तो हॉकी हमारे लिए मुगल काल के इतिहास की तरह कोई पुरानी याद बन कर रह गई है। भारतीय हॉकी फैडरेशन की हालत इतनी खराब है कि उसकी बैठकों में या तो लोग पहुंचते नहीं हैं या पहुंच कर फिर झगड़ा करते हैं। अपने तानाशाह रवैये के लिए मशहूर कंवर पाल सिंह गिल और भारतीय फैडरेशन के महासचिव ज्योति कुमारन को तो अंदाजा भी नहीं है कि दुनिया में लोग भारतीय हॉकी का कितना मजाक उड़ा रहे हैं। यह बात अलग है कि पूरी दुनिया में हॉकी की दशा खराब है क्योंकि यह क्रिकेट नहीं है। सच तो यह है कि 2012 के लंदन ओलंपिक में हॉकी को शामिल किए रखने के बारे में बाकायदा मतदान हुआ और सिर्फ एक वोट से हॉकी बची रह गई। यह एक वोट भारत का नहीं था क्योंकि भारतीय प्रतिनिधि इस बैठक में जाने के लिए टिकट खरीदने का पैसा भारत के खेल मंत्रालय ने मंजूर नहीं किया था। इसीलिए किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि आखिरी ओलंपिक हमने 1980 में जीता था और आखिरी विश्व कप 1975 में।

महिला हॉकी पर चक दे इंडिया बनी तो अचानक लोगों को लगा कि हॉकी का जमाना वापस आ रहा है। फिल्म बनाने वालों ने पैसा कूट लिया और शाहरुख खान को फिल्म फेयर में सबसे अच्छी एक्टिंग का अवॉर्ड मिल गया। मिलना भी चाहिए था। जिस खेल की देश में इतनी दुर्दशा हो, उसमें इतने उत्साह का अभिनय कोई करामाती अभिनेता ही कर सकता है। यहां यह मत भूलिए कि हॉकी के स्वयभूं ब्रांड एम्बेसडर कहे जाने वाले शाहरुख खान को जब मौका मिला, तो उन्होंने पैसा लगाने के लिए क्रिकेट को चुना। आखिर धंधा अलग है और जोश और जुनून अलग। अभी संसद चल रही है और सरकार चाहे तो हॉकी की बजाय क्रिकेट को राष्ट्रीय खेल बनाने का विधेयक ला सकती है। आखिर 2010 में भारत में ही हॉकी का विश्व कप होना है और 2008 में हम बीजिंग ओलंपिक के मैदान तक नहीं पहुंच सके।
(शब्दार्थ)

1 comment:

आशीष said...

सच कहूं तो हाकी अपने ही देश में बेगानी हो गई है।