Tuesday, March 11, 2008

हॉकी के बंटाधार के लिए कौन जिम्मेदार?


हॉकी के बंटाधार के लिए कौन जिम्मेदार?
संजय शर्मा
अगर हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद 100 साल जी गए होते, तो हॉकी को रसातल में जाते देखकर न जाने उन पर क्या बीतती। हालांकि वर्ष 1979 में जब उनका निधन हुआ, तब वह मांट्रियल ओलंपिक में भारत का बुरा प्रदर्शन देख चुके थे। लेकिन 80 साल में यह पहली बार है, जब भारतीय हॉकी टीम ओलंपिक के लिए क्वालिफाई नहीं कर पाई। चिली में फाइनल में ब्रिटेन ने उसे 2-0 से पीट दिया। यानी वर्ष 1928 के बाद पहली बार होगा, जब आठ बार स्वर्ण पदक जीतने वाली टीम ओलंपिक में नहीं होगी। जाहिर है, इस हार पर पूरे भारत में हायतौबा मची हुई है।

भारत की खोज में निकले राहुल गांधी ने चयन में पक्षपात को जिम्मेदार बताया है, तो कुंभकर्णी नींद में पड़े खेल मंत्रालय के मौजूदा मंत्री मणिशंकर अय्यर ने लंबी रणनीति बनाने की बात कही है। कुछ सांसदों ने अफसोस जताया है, तो कुछ पूर्व ओलंपियनों ने ठीकरा अध्यक्ष केपीएस गिल पर फोड़ा है। एक समय अध्यक्ष के चुनाव में गिल के खिलाफ खम ठाेंकने वाले उपाध्यक्ष नरेंद्र बतरा की अंतरात्मा अलसुबह जाग गई और उन्होंने इस्तीफा दे दिया। पूर्व ओलंपियन जलालुद््दीन साहब ने बताया कि हॉकी वालों में एक जुमला खूब चलता है कि गिल साहब जो जिम्मेदारी लेते हैं, उसे खत्म करके ही दम लेते हैं। पहले पंजाब से आतंक को खत्म किया, अब हॉकी को खत्म करेंगे। गिल साहब का कहना है कि इस्तीफा नहीं देंगे
हॉकी को वक्त चाहिए। यह कोई इन्स्टेंट कॉफी मशीन नहीं है। हालांकि वह काफी वक्त ले चुके हैं।
दरअसल सचाई यह है कि कभी हिटलर तक को मोहित करने वाली भारतीय हॉकी की सफलता के जमाने में इसके बहुत माई-बाप थे, आज भी हैं। लेकिन इन सबने इसकी ठीक से परवरिश नहीं की। वर्ष 1975 का वर्ल्ड कप जब हम जीते थे, तब वह टीम भारतीय ओलंपिक संघ ने भेजी थी, क्योंकि तब हॉकी फेडरेशन में झगड़ा चल रहा था।
विडंबना देखिए कि जब हमारे यहां छीना-झपटी का खेल चल रहा था, तब दूसरे देश इस खेल में भारत-पाकिस्तान के दबदबे को खत्म करने के लिए इसे एस्ट्रो टर्फ पर लाकर कलात्मक की जगह 'पावर गेम' बनाने में जुटे थे। ऑस्ट्रेलिया ने जिस भारतीय शख्स को वर्ष 1971 के आसपास अपनी टीम का कोच बनाया था, उसे हमारे फेडरेशन वालों ने कभी घास नहीं डाली। जहां यूरोपीय हॉकी को एस्ट्रो टर्फ पर लाने वाले थे, वहीं कंगारुओं ने इस भारतीय शख्स की मदद से एशियाई और यूरोपीय हॉकी को मिलाकर अपनी हॉकी को 'खच्चर' बना डाला। उसके बाद हॉकी में आस्ट्रेलिया की ताकत दुनिया ने देखी।
आखिरी बार हम वर्ष 1975 में क्वालालंपुर में घास के मैदान पर विश्व चैंपियन बने थे। और मॉस्को में पॉलीग्रास (यह भी कृत्रिम घास थी) पर ताकतवर मुल्कों की गैरमौजूदगी में हमने ओलंपिक जीता था। लेकिन हमारी हॉकी ने वर्ष 1976 के मांट्रियल ओलंपिक में मानो कफन ओढ़ लिया। भले ही लोग कहें कि इस पर आखिरी कील अब ठुकी है, लेकिन इसका एक ठोस पहलू यह भी है कि वर्ष 1983 में कपिल देव की टीम के इंगलैंड में विश्व कप क्रिकेट जीतने के साथ ही इसका पतन शुरू हो गया था।
हॉकी को रसातल में ले जाने का जिम्मा भले ही हॉकी फेडरेशन का हो, लेकिन कुछ बातें हैं, जिन पर गौर करें, तो हॉकी में फैली हताशा समझी जा सकती है। इसकी एक वजह तो क्रिकेट का ब्रांड बनना या उसका एकाधिकार ही है। फिर हॉकी के राष्ट्रीय खेल होने और वेस्ट इंडीज क्रिकेट के पराभव का भी विश्लेषण करें, तो बात आसानी से समझ में आ जाएगी। हर कोई जानता है कि एकाधिकार या प्रभुत्व ऐसे बरगद हैं, जिनके नीचे कोई दूसरा वृक्ष पनप नहीं सकता। क्रिकेट रूपी बरगद ब्रांड के नीचे हॉकी समेत अन्य सभी खेल दबते चले गए। हॉकी में 1975 की पराजय के दस साल के भीतर क्रिकेट भारत में ब्रांड बनने लगा था।
यह जानकर हैरत होगी कि वर्ष 1983 की विजेता टीम की अगवानी और सम्मान कार्यक्रम कराने के लिए लता मंगेशकर ने बीसीसीआई के लिए पैसे जुटाए थे, क्योंकि क्रिकेट को भारत सरकार से वित्तीय सहायता नहीं मिलती थी और बीसीसीआई केपास इतने पैसे नहीं थे। वैसे यह क्रिकेट के लिए शुभ ही रहा।
एक अन्य बिंदु है वेस्ट इंडीज क्रिकेट का पराभव, जिससे हम भारतीय हॉकी की दुर्गति को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं। वेस्ट इंडीज की क्रिकेट अचानक निचली पायदान पर नहीं गई। इसकी प्रक्रिया तभी शुरू हो गई थी, जब यह टीम शिखर पर थी। तब उन 15-20 सालों में वहां के बच्चे-किशोर क्रिकेट के बजाय बास्केटबॉल को अपना रहे थे। जानते हैं क्यों? उन्हें बगल में बसे अमेरिका में अपना भविष्य सुरक्षित नजर आया। वहां बास्केटबॉल में इफरात पैसा था और इस मामले में कंगाल वेस्ट इंडीज बोर्ड अपनी कामयाबी के मद में इतना चूर था कि वह जान ही नहीं पाया कि उसके पैरों तले जमीन खिसक चुकी है। नतीजा यह हुआ कि जिन प्रतिभाशाली लड़कों में लॉयड, होल्डिंग, गार्नर, रिचड््र्स बनने के गुण थे, वे बास्केटबॉल में नामी हो गए।
हमें यह समझना होगा कि किसी भी देश में बेहतरीन मेधा सीमित ही होती है और यह उसके तंत्र पर निर्भर करता है कि वह विभिन्न क्षेत्रों या खेलों में अग्रणी बनने के लिए उसका उपयोग समान रूप से कैसे करता है। कहना न होगा कि इस मोरचे पर हमारा प्रबंधन तंत्र बुरी तरह से विफल रहा है। विभिन्न खेल संघों पर राजनेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों के कब्जे ने हालात को बदतर बनाया है। ऐसे में, स्वाभाविक रूप से हॉकी समेत तमाम खेलों में पेशेवर नजरिये की कमी देखी गई।
वर्ष 1983 में क्रिकेट में जीत और 1976 में मांट्रियल ओलंपिक की हार के नतीजों के संभावित परिणामों का हमारी सरकार और भारतीय ओलंपिक संघ सही आकलन नहीं कर पाए। उनमें शायद इतनी दूरदर्शिता थी भी नहीं। क्रिकेट में जीत से लोगों को ऐसा नशा मिला, जिसे बढ़ना ही था। इसमें ग्लैमर आया, पैसा घुसा, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की क्रांति के बाद यह छोटे शहरों और कसबों में पसर गया। नतीजा यह हुआ कि जो यूपी, बिहार (झारखंड), पंजाब, हरियाणा हॉकी, फुटबॉल, कुश्ती, बॉलीवॉल और बास्केटबॉल की नर्सरी होते थे, आज वहां के कसबों-गांवों की दिमागी और शारीरिक तौर से मजबूत बाल-किशोर प्रतिभाएं क्रिकेट की सप्लाई लाइन बन गई हैं। अगर सरकार और खेल संगठनों ने सभी क्षेत्रों में इस सप्लाई लाइन के समान वितरण के गणित को नहीं समझा, तो यह कहने में तनिक भी हिचक नहीं होनी चाहिए कि देश से दूसरे खेलों का वजूद मिटते देर नहीं लगेगी।
(लेखक अमर उजाला से जुड़े हैं)

15 comments:

Anonymous said...

जनसत्ता को ऑनलाइन देख कर खुशी हुई। आपने कहा है कि यह प्रभाष जी के चेलों का ब्लॉग है। मगर जिस तरह की भाषा और विचारों का इसमें समावेश है, हैरानी होती है कि प्रभाष जी ने ऐसा करने की इजाजत दी होगी। शायद यह सब देख-पढ़ कर उन्हें अफसोस होता हो कि उन्होंने ऐसे चेले पाले या उन्हें ऐसे लोग गुरु मानते हैं। क्या ऐसी भाषा में और ऐसे विचारों के साथ ऑनलाइन जनसत्ता को जनता का अखबार बनाया जा सकता है? लगता है यह किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ मुहिम चलाने का हथियार बन कर रह गया है।

NAGRIK said...

जनसत्ता को पसंद करने वाले भाईसाहब, आप को न प्रभाष जी के बरे में कुछ पता है न जनसत्ता के बरे में. क्या कोई व्यक्ती इतना महत्वपूर्ण हो सकता है कि इतने सारे लोग अकारण उसके पीछे पड़ जायें. जनसत्ता ऑनलाइन को प्रभाष जी का आशीर्वाद प्राप्त है या नहीं, यह टू नहीं पता मगर उनके बाद के सम्पादक संघी, या स्वयं सेवक ही आए. एक साहब तो एन जी ओ चला कर कमा रहे है और दूसरे संघ परिवार की कृपा से पत्रकारिता के एक संस्थान के बास बने हुए हैं. बचे वर्त्तमान संपादक तो वे दफ्तर से ज्यादा क्लबों और पार्टी आदि में टुन्न नज़र आते हैं.जनसत्ता जैसे अभियान की इन भी लोगों ने ऐसी-तैसी कर दी है और जब तक वाइरस बना रहेगा, आपको पुराना जनसत्ता कौन देगा. कसूर प्रभाष जी का भी कम नहीं है. इन अखबारी अमरबेलों को जन्म भी टी उन्हीं ने दिया है.

Anonymous said...

ये कोई जनसत्ता के खँडहर अखबार का ट्रेनी लगता है, जो बेचारा कभी कन्फर्म नहीं होगा

Anonymous said...

aaj bhi jansatta akhbar vishva ke mahan aur karodo pathak vale un akbaro se behtar hai jo fainta ki botal me chipkali ki pooch ko pahele page ki khabar mante hai.gandhi ji ka harijan koi line laga ker nahi bikta tha jansatta ka print edition aaj bhi rajnaitik aur manviy khabro me aur akhbaro
se behtar hai sampadak ke daru pine se akbar nahi bigad jata .sp singh bhi daru pite the.aur kam se kam jesika lal hatyakand ke gunahgaro ko bachane vale patrkaro
se behter jansatta hai.prabhash ji ne koi chela panth nahi chalaya tha aur ghanghor sanghi patrkar bhi unke sath hai.om thanvi koi jansatta ke maibap nahi hai.
ajit

NAGRIK said...

मेरे फेंटा विक्रेता मित्र आप तो बुरा मान गए. गुरु अपना पंथ कबी नह्हें बनाता, वो तो चेले ख़ुद बना लेते हैं. सेकडों स्ट्रिंगर दोस्तों का शोषण कर के शोषितों की कहानी छापना अपराध है. इन्सान की हड्डी में फूँक मारो तो वो भी बांसुरी सी बज उठती है. आप उससे राग मल्हार सुनना चाहेंगे? जनसत्ता अब सिर्फ़ स्मृति रह गया है, गालिब की हवेली की तरह जहाँ हाल तक कोएले की ताल चलती थी. इतवार को बीच के दो पन्ने निकल दो तो वैसा ही मोह भंग होगा जैसा किसी सुन्दरी की तस्वीर के बाद उसके चेहरे का एक्स रे देख कर होता है.छिपकली की पूंछ जब तक छिपकली में होती है तभी तक पूंछ है वरना ख़बर तो बनती ही है गुरु. जनसत्ता को पाठकों की कमी नहीं है लेकिन वे हैं सिर्फ़ पत्रकार ही. जब तक प्रभाष जी से संस्कार पाने वाल एक भी व्यक्ति जीवित है, जनसत्ता है. बाकी नाम में क्या धारा है मेरे दोस्त! फिमी कल्याण का नाम कल्याण रख दो तो भी वो रहेगी वही.

NAGRIK said...

यह चर्चित कविता स्व. रघुवीर सहाय ने १९५२ में लिखी थी .


पढ़िए गीता
बनिए सीता
फिर इन सबमें लगा पलीता
किसी मूर्ख की हो परिणीता
निज घरबार बसाइये .

होंय कंटीली
आंखें गीली
लकड़ी सीली , तबियत ढीली
घर की सबसे बड़ी पतीली
भरकर भात पसाइये .

राज किशोर नामक महान समाजवादी की ये रचना पढ़ें और सीखें साहित्यिक चोरी की कला
सीता है या गीता है

जीवन भर की मीता है



उसका दर्ज़ा सर्वोपरि

आखिर वह परिणीता है



मीठा से मीठा रिश्ता

उसके आगे तीता है



तृष्णा उसे सताए क्यों

जो इस रस को पीता है



कइयों का कहना है यह

हिरन भेस में चीता है



कहता हूं मैं प्यारे तू

अगर खरा हो जीता है



आगे बेहतर बीतेगा

जैसा अब तक बीता है।

1952 में स्व. रघुवीर सहाय ने लिखा था - हम याद करा रहे हैं और राजकिशोर को भी जरूर याद होगा , यदि यह ‘रविवार’ वाले ही हैं तब . क इयों की छोडिये आप भी तो ‘तीता-रस-पीता’ वाले हो गये.अपनी डायरी में अपने लिए लिखिये,छापने मत दीजिए.न यहां न ‘सामयिक वार्ता’ में .
. राजकिशोर का खरापन संदिग्ध है . कितनी गिरावट है सहाय जी को पढ़ने से अन्दाज मिल जाता है .
अफलातून को धन्यवाद सहित

Anonymous said...

gazab hai abhi tak rajkishore gandi gali ke liye badnam tha ab sahitya ki chori me bhi aage badh gaya hai.
sanghi logo ko gali dene vale rajkishore jaise samjvadi ke bare me bhi kuch bolenge.

atul chaurasia said...

आईपीएल में खिलाड़ी की बोली लग रही है। धक्कम पेल मची है टीम में घुसने की। अब तो ये भी नहीं समझ आएगा की किसकी तारीफ करें किसको गरियाएं। एक ही टीम में अपना फेवरेट धोनी, हरभजन भी खेलेगा और उसी में परम दुश्मन साइमंड और पोंटिंग जैसे भी। फिर भी करोड़ों में उन्हें हथियाने की लहर है। अभी एक और निलामी होनी है। यानी चहुंओर “जय क्रिकेट जय क्रिकेटवान” का नारा बुलंद है। यहां फिर भी थोड़ी बहुत पारदर्शिता बची हुई है। हर साल बोर्ड के अध्यक्ष का चुनाव होता है। अध्यक्ष भी अमूमन बदलते रहे हैं। हालांकि मठाधीशी की कोशिशें डालमिया जैसे लोग करते रहे हैं। पर कुल मिलाकर क्रिकेट में बाकी खेलों जितना बपौती सिस्टम नहीं है।
अब देखिए पावर हाउस ऑफ हॉकी के देश में हॉकी की दुर्दशा को। यहां एक आदमी पिछले दशक भर से कब्जियाए बैठा हुआ है। और अस्सी सालों में पहली दफा हॉकी टीम ओलंपिक में नज़र नहीं आएगी। दुनिया आती रहे जाती रहे हॉकी इनके पैरों की वधू है। तमाम लोगों को शरम हया है। वो इस दुर्दिन के लिए छमा याचना करने को तैयार हैं। कोच ने इस्तीफा दे दिया है लेकिन ये नहीं छोड़ेंगे। रसातल में पहुंचाने के बाद भी लगता है भारतीय हॉकी को अभी इससे भी बुरा कुछ देखना है। आतंकवाद से निपटने की तर्ज हॉकी जैसे खेल पर कैसे फिट हो सकती है। क्या इतना जानने का हक किसी को नहीं हैं। इस देश में हर आदमी जवाबदेह है। आखिर राष्ट्रीय खेल की इस दुर्दशा पर पूरे खेल को अपनी पैरों की दासी बनाए रखने वाले इस शख्स से जवाबलतब क्यों नहीं हो रहा है?
चुनावी बरसात में बड़ी बड़ी टर्र टर्र करने वाले नेता किसी न किसी खेल संघ पर दशकों से कब्जा जमाए बैठे हैं। और खेलों की हालत लगातार रसातलगामी है। कोई जवाबदेह क्यों नहीं है? यहां कोई पारदर्शिता क्यों नहीं है? क्या हॉकी को मौत देकर ही मानोगे? राष्ट्रीय खेल का निशान मिटाकर ही दम लोगे? मेजर की आत्मा कराह रही है। थोड़ी शर्म बची हो तो ईमानदार कोशिश कर लो। वरना अस्सी सालों में जो नही हुआ वो अब हो रहा है और आगे इससे भी बुरा होगा।
अतुल चौरसिया

Anonymous said...

kishan patnayak ki virasat per
kabja karne vale pakhadiyo me raj kishore bhi hai,samyek varta me aur bhi pakhandi hai.sab badi badi bate karenge chote chote raiket chalayenge.
surendra mohan

Anonymous said...

alok ji

aap ki dukan chali nahi ab band ker de,aap ke thake hue
lekho ke alava kuch nahi hai.prabhash ji ne bhi isse koi
sambandh hone se inkar ker diya hai.khali thanvi ji kuch virodhi
ise dekh rahe hai.

ajit

Anonymous said...

alok ji

aap ki dukan chali nahi ab band ker de,aap ke thake hue
lekho ke alava kuch nahi hai.prabhash ji ne bhi isse koi
sambandh hone se inkar ker diya hai.khali thanvi ji kuch virodhi
ise dekh rahe hai.

ajit

alok tomar said...

मेर्व 'गुमनाम' मित्र अजित जी
आप तो सावित्री से भी बड़े पतिव्रताधारी निकले. आपको क्या लगता है की जनसत्ता कोई दूकान है जो किसी जमूरे के नहीं बकने से बंद हो जायेगी? आप इसे पढ़ रहे हैं इसी से जाहिर है कि आ प भी, जैसा आपने ख़ुद कहा, आप ओम थानवी विरोधी हैं. में तो थानवी जी का बहुत आदर करता हूँ , उनकी प्रतिभा को कोई बड़ा मंच मिलना छाहिये था-जैसे वीर अर्जुन या पंजाब केसरी,और जनसत्ता के कागजी संसकरण के संपादक वे रहें या आप बन जाएं इस से मुझे या किसी भी पाठक को क्या असर पड़ता है? प्रभाष जी का इस अभियान से कोई सम्बन्ध था या है, ये आप से कौन कह गया.? मेरा रिश्ता प्रभाष जी से पिता पुत्र का है और वैसा नहीं जैसे आपने अचानक ॐ जी को अपना बाप बना लिया है. थानवी जी ऐसी नालायक औलाद पा कर लज्जित ही हो रहे होंगे जो गुमनाम भी है और हिन्दी भी नहीं लिख पाती. मेरे लेखों को सिर्फ़ थका हुआ कहने के लिए धन्यवाद वरना, तीन वेचारे छात्रिन का दिल टूट जाता जो गरीब मेरे लिखे पर पी एच डी के लिए शोध कर रहे हैं. आपको शुभ कामना, मगर बडों के बीच आने वाले बच्चों का भविष्य उज्जवल नहीं होता.

आपका
आलोक तोमर

Anonymous said...

ajit, aalok tomar ke likhe par swal uthaane ke pahle thaanvee jee se hee pooch liya hota. vaise kitne padhe likhe hain aap

NAGRIK said...

आलोक जी ने जनसत्ता से हटने के बाद चार किताबें, पाँच टी वी सीरियल और एक फ़िल्म लिखी है. अपनी कलम की दम पर ही वे आठ लाख कि कार में चलते हैं, अपना मकान दक्षिण दिल्ली में बनाया है, ओम जी की तरह अवैध निर्माण वाले फ्लैट में नहीं रहते, और उनकी वेबसाईट के करोड़ों पाठक हैं.. बस उनके पास होम थिएटर नहीं है और वे फ्रेंक सिनात्रा की बजाय कारन जौहर और महेश भट्ट की फिल्में पसंद करते हैं. पाखंड नहीं करने वाले एक पत्रकार पर कमेन्ट करने वाला निरक्षर ही होगा.

Anonymous said...

Greets dudes!

I just wanted to say hi :)